Tuesday, 16 June 2020

ट्विट्टर पर "कॉलेजियम सिस्टम कलंक है" नम्बर एक पर ट्रेंड कर रहा है. करवाने वाले अपने ही सहयोगी है. यह विषय क्या है?. इसे जानना भी जरूरी है. ट्विट्टर पर सिमित शब्दों के कारण लिख नही सकता. इसलिए इस विषय पर जब पहले ट्विट्टर पर ट्रेंड हुआ था तब मेने 30 अप्रैल को एक लेख लिखा था. पुन: इन्हा लिख रहा हूँ.
कोलोजियम का उल्लेख सँविधान में नही है
आरक्षण का प्रावधान "संविधान" में किया गया है, सुप्रीम कोर्ट ने इसकी समीक्षा का निर्णय दिया है, जिसमे सरकार को कहा गया है की आरक्षण प्रणाली की समीक्षा करे. बल्कि अखबारों में छपी खबरों के अनुसार यह तल्ख़ टिपन्नी तक करी है की "राजनीती" के कारण राजनीतिक पार्टिया आरक्षण पर कोई निर्णय नही देती है. जबकि आरक्षण होना चाहिए या नही, कब तक होना चाहिए, कितना होना चाहिए, किस रूप में होना चाहिए, यह सभी संसद के अधिकार में आता है. सुप्रीम या हाईकोर्ट के पास केवल "न्यायिक पुनर्विलोकन" की शक्ति है, जिसमे उन्हें सिर्फ यह देखना है की अगर संसद आरक्षण से सम्बन्धित कोई कानून पास करती है तो वो कानून संविधान के अनुसार है या नही.
कॉलेजियम प्रणाली का कोई भी जिक्र संविधान में नही है, इसकी समीक्षा पर कोई निर्णय नही आता है. वास्तव में कॉलेजियम का उदभव सुप्रीम कोर्ट द्वारा;
प्रथम न्यायधीश निर्णय 1982
दुसरे न्यायधीश निर्णय 1993
तीसरे न्यायधीश निर्णय 1998
के कारण हुआ है.जिसमे;
1.सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश व 4 अन्य न्यायधीश से मिलकर कॉलेजियम बनता है।
2.कॉलेजियम का कार्य उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय मे नियुक्ति, ट्रांसफर वगैरह से सम्बन्धित परामर्श केंद्र सरकार को देना है.
3.कॉलेजियम जो सिफारिश केंद्र सरकार से करती है, केंद्र सरकार उसकी छानबीन या जांच करके आपत्ति या फिर कुछ नाम की सिफारिश के साथ इसे कॉलेजियम के पास पुन: विचार के लिए वापस भेजेगी.
4. कॉलेजियम केंद्र सरकार की सिफारिश, आपत्तिओ पर विचार करेगा, अगर सही लगेगा तो ही इन सिफारिश को मानेगा. इसके बाद कॉलेजियम अपनी सिफारिश दुबारा से केंद्र सरकार के पास भेजेगा. जिसे केंद्र सरकार को मानना ही पड़ेगा अथार्त राष्ट्रपति के लिए इसे मानना बाध्यकारी है.
अब इसमें;
1.कोई परीक्षा नही होती है.
2.उच्च न्यायालय में प्रेक्टिस कर रहे वकील या सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस कर रहे वकीलों को चुन सकती है. जो मिनिमम योग्यता रखते है, उसमे से किसी को भी चुन सकती है.
3.इसमें कितने एससी, एसटी, ओबीसी होने चाहिए, ऐसी कोई बाध्यता नही है. चाहे तो इनमे से चुन सकती है, या फिर एक को भी न चुने.
कॉलेजियम की ही देन है की;
1.कई बार अखबारों में यह खबर प्रकाशित हो चुकी है कि अधिकतर जज किसी अन्य जज का अंकल है. अथार्त रिश्तेदार है. कुछ ही परिवारों में आपस में जजों के पदों का बंटवारा हो रहा है .
2.पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह ने आरोप लगाया था की भारत में उच्च न्यायालय व सुप्रीम कोर्ट में आजादी के बाद 250 से 300 परिवारों से ही जज बन रहे है. जिसमे;
"एससी, एसटी, ओबीसी के लिए कुछ अपवाद को छोडकर प्रतिनिधित्व के आधार पर जज बनना मुश्किल है. यह ही कारण है सुप्रीम कोर्ट में 33 जज है, जिनमे से केवल एक अनुसूचित जाति से है"
यह ही कारण है कि;
"ट्विट्टर पर कोलोजियम को खत्म करने के लिए लोगो ने मुहिम चलाई जो कि टॉप ट्रेंड में रही अथार्त एससी/एसटी/ओबीसी इस व्यवस्था को पसन्द नही कर रहे है"
बसपा सरकार में प्रोफेशनल कोर्स करवाने वाले उत्तर प्रदेश की 25% एससी/एसटी जनसँख्या की बस्तियों में घूम घूमकर वो बच्चे खोजते थे जिन्होंने 12 वी पास की थी या एक्साम दिया था, रिजल्ट आने वाला था। उन्हें प्रोफेशनल कोर्स जैसे BCA, BBA, B.Tech, MBA से लेकर तमाम कोर्स का महत्व बताते थे क्योंकि राज्य सरकार का सख्त निर्देश था , एडमिशन करवाये, उनमे से आज हजारो बढ़िया सैलरी कमाकर अपना और अपने परिवार का स्टेंडर्ड अच्छा कर चुके है।
वर्तमान यह हालत हो गयी है कि विश्वविद्यालय एक्साम फार्म जारी करता है और आदेश देता है कि एससी एसटी के फार्म भरवा लीजिये लेकिन रिजल्ट तब तक जारी न करेंगे, जब तक उनकी फीस वो स्वयं या छात्रवर्ती के रूप में न आ जाये।
अब छात्रवर्ती राज्य सरकार देती है। मतलब विश्वविद्यालय को राज्य सरकार की गारंटी पर भी भरोसा नही रहा क्या?. जब प्रवेश प्रक्रिया से एडमिशन हुआ है, छात्रव्रती के फार्म भरे जा चुके है तो थोडा देर से ही सही, शासन से फ़ीस प्रतिपूर्ति आ ही जाएगी. फिर ऐसे नोटिफिकेशन की क्या जरूरत है?.
चल क्या रहा है?.
मतलब बीए जैसे कोर्स अगर कोई प्राइवेट संस्थान से कर रहा है तो उसका भी रिजल्ट तब तक जारी नही होगा जब तक कि राज्य सरकार उसकी छात्रवर्ती की फीस नही भेजेगी।
वैसे यह मुझे अच्छा लगा। एससी/एसटी को ज्यादा ही कट्टरवादी होने का भूत चढ़ गया है। उतरना भी जरूरी है।

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