Tuesday, 16 June 2020

मनुवादी और बहुजनो में क्या अंतर हैं ? थोडा सा विचार जरुर करें

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वो धन के लिए लड़ता है,
हमें धर्म के लिए लड़वाता हैं ।
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वो संसद की तरफ दौडता है,
हम तीर्थ स्थल की तरफ दौडते हैं।
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वो अपने बच्चो को कॉलेज भेजता है,
हम मंदिर व कांवड़ लेने भेजते हैं ।
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वो कथा भागवत करता है ,
हम कथा भागवत करवाते हैं ।
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वो हम से दान दक्षिणा लेता है ,
हम उसको दान दक्षिणा देते हैं ।
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वो हमको झूठा आशीर्वाद देता है ,
हम उसके पैरों में पड़़ जाते हैं ।
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वो हमको गुलाम बनाता है ,
हम उसके गुलाम बन जाते हैं ।
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वो मुसलमानों के प्रति भडकाता है ,
हम सब भडक जाते हैं ।
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वो हमको बर्बाद करना चाहता है ,
हम उसको आबाद करना चाहते हैं ।
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वो हमसे हमेशा ईर्ष्या रखता है ,
हम उससे हमेशा अनुराग रखते हैं ।
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वो अपने घर में कभी सत्यनारायण की पूजा नहीं करता है ,
पर हम से हमेशा करवाता है ।
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वो हमेशा सब की कुंडली बनाता है ,
पर अपनी कुंडली किसी से नहीं बनवाता ।
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उसकी नजर पैसों पर रहती है ,
हमारी नजर कर्मकांडों पर रहती है।
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उसका अधिकार सभी मठ मंदिरों पर है,
हमारा अधिकार किसी मठ मंदिर पर नहीं है।
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वो हर समय धन दौलत में खेलता है ,
हम अपनी रोज़ी रोटी के लिए दिन रात एक करते हैं ।
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वो बगैर पसीने की कमाई करता है ,
हम पसीना बहा कर कमाई करते हैं ।
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उसका 10 साल का बच्चा अपना इतिहास जानता है,
हमारा 60 साल का बुड्ढा भी अपना इतिहास नहीं जानता है।
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वो हमसे अपने पूर्वजों की पूजा करवाता है ,
हमारे महापुरुषों को हमसे ही गाली दिलवाता है ।
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वो कभी मंदिर में दान नहीं करता ,
हमेशा हम से ही दान करवाकर उस तिजोरी साफ कर देता है ।
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वो मंदिरो के चढावे से तिजौरियां भरता है ,
हम अपनी गाढ़ी कमाई मंदिरो में चढा कर गरीब बन जाते हैं ।
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वो अपनी चतुर बुद्धि से भारत पर राज कर रहा है ,
हम अपनी मंद बुद्धि के कारण उसकी गुलामी करते हैं ।
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जीवन में दुख भी वही बताता है उपाय भी वही बताता है ,
हम उसके नचाये नाचते हैं ।
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भारत में उसकी संख्या 3% है लेकिन 68% जगहों पर विराजमान है ।
हमारी संख्या 85% है लेकिन हम 15% जगहों पर भी नहीं हैं।
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वह अपने महापुरुषों का सम्मान करता है व हमसे करवाता है ,
हमसे हमारे ही महापुरुषों का अपमान करवाता है
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जागो और जगाओ।
व्यवस्था परिवर्तन कराओ।
ट्विट्टर पर "कॉलेजियम सिस्टम कलंक है" नम्बर एक पर ट्रेंड कर रहा है. करवाने वाले अपने ही सहयोगी है. यह विषय क्या है?. इसे जानना भी जरूरी है. ट्विट्टर पर सिमित शब्दों के कारण लिख नही सकता. इसलिए इस विषय पर जब पहले ट्विट्टर पर ट्रेंड हुआ था तब मेने 30 अप्रैल को एक लेख लिखा था. पुन: इन्हा लिख रहा हूँ.
कोलोजियम का उल्लेख सँविधान में नही है
आरक्षण का प्रावधान "संविधान" में किया गया है, सुप्रीम कोर्ट ने इसकी समीक्षा का निर्णय दिया है, जिसमे सरकार को कहा गया है की आरक्षण प्रणाली की समीक्षा करे. बल्कि अखबारों में छपी खबरों के अनुसार यह तल्ख़ टिपन्नी तक करी है की "राजनीती" के कारण राजनीतिक पार्टिया आरक्षण पर कोई निर्णय नही देती है. जबकि आरक्षण होना चाहिए या नही, कब तक होना चाहिए, कितना होना चाहिए, किस रूप में होना चाहिए, यह सभी संसद के अधिकार में आता है. सुप्रीम या हाईकोर्ट के पास केवल "न्यायिक पुनर्विलोकन" की शक्ति है, जिसमे उन्हें सिर्फ यह देखना है की अगर संसद आरक्षण से सम्बन्धित कोई कानून पास करती है तो वो कानून संविधान के अनुसार है या नही.
कॉलेजियम प्रणाली का कोई भी जिक्र संविधान में नही है, इसकी समीक्षा पर कोई निर्णय नही आता है. वास्तव में कॉलेजियम का उदभव सुप्रीम कोर्ट द्वारा;
प्रथम न्यायधीश निर्णय 1982
दुसरे न्यायधीश निर्णय 1993
तीसरे न्यायधीश निर्णय 1998
के कारण हुआ है.जिसमे;
1.सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश व 4 अन्य न्यायधीश से मिलकर कॉलेजियम बनता है।
2.कॉलेजियम का कार्य उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय मे नियुक्ति, ट्रांसफर वगैरह से सम्बन्धित परामर्श केंद्र सरकार को देना है.
3.कॉलेजियम जो सिफारिश केंद्र सरकार से करती है, केंद्र सरकार उसकी छानबीन या जांच करके आपत्ति या फिर कुछ नाम की सिफारिश के साथ इसे कॉलेजियम के पास पुन: विचार के लिए वापस भेजेगी.
4. कॉलेजियम केंद्र सरकार की सिफारिश, आपत्तिओ पर विचार करेगा, अगर सही लगेगा तो ही इन सिफारिश को मानेगा. इसके बाद कॉलेजियम अपनी सिफारिश दुबारा से केंद्र सरकार के पास भेजेगा. जिसे केंद्र सरकार को मानना ही पड़ेगा अथार्त राष्ट्रपति के लिए इसे मानना बाध्यकारी है.
अब इसमें;
1.कोई परीक्षा नही होती है.
2.उच्च न्यायालय में प्रेक्टिस कर रहे वकील या सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस कर रहे वकीलों को चुन सकती है. जो मिनिमम योग्यता रखते है, उसमे से किसी को भी चुन सकती है.
3.इसमें कितने एससी, एसटी, ओबीसी होने चाहिए, ऐसी कोई बाध्यता नही है. चाहे तो इनमे से चुन सकती है, या फिर एक को भी न चुने.
कॉलेजियम की ही देन है की;
1.कई बार अखबारों में यह खबर प्रकाशित हो चुकी है कि अधिकतर जज किसी अन्य जज का अंकल है. अथार्त रिश्तेदार है. कुछ ही परिवारों में आपस में जजों के पदों का बंटवारा हो रहा है .
2.पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह ने आरोप लगाया था की भारत में उच्च न्यायालय व सुप्रीम कोर्ट में आजादी के बाद 250 से 300 परिवारों से ही जज बन रहे है. जिसमे;
"एससी, एसटी, ओबीसी के लिए कुछ अपवाद को छोडकर प्रतिनिधित्व के आधार पर जज बनना मुश्किल है. यह ही कारण है सुप्रीम कोर्ट में 33 जज है, जिनमे से केवल एक अनुसूचित जाति से है"
यह ही कारण है कि;
"ट्विट्टर पर कोलोजियम को खत्म करने के लिए लोगो ने मुहिम चलाई जो कि टॉप ट्रेंड में रही अथार्त एससी/एसटी/ओबीसी इस व्यवस्था को पसन्द नही कर रहे है"
बसपा सरकार में प्रोफेशनल कोर्स करवाने वाले उत्तर प्रदेश की 25% एससी/एसटी जनसँख्या की बस्तियों में घूम घूमकर वो बच्चे खोजते थे जिन्होंने 12 वी पास की थी या एक्साम दिया था, रिजल्ट आने वाला था। उन्हें प्रोफेशनल कोर्स जैसे BCA, BBA, B.Tech, MBA से लेकर तमाम कोर्स का महत्व बताते थे क्योंकि राज्य सरकार का सख्त निर्देश था , एडमिशन करवाये, उनमे से आज हजारो बढ़िया सैलरी कमाकर अपना और अपने परिवार का स्टेंडर्ड अच्छा कर चुके है।
वर्तमान यह हालत हो गयी है कि विश्वविद्यालय एक्साम फार्म जारी करता है और आदेश देता है कि एससी एसटी के फार्म भरवा लीजिये लेकिन रिजल्ट तब तक जारी न करेंगे, जब तक उनकी फीस वो स्वयं या छात्रवर्ती के रूप में न आ जाये।
अब छात्रवर्ती राज्य सरकार देती है। मतलब विश्वविद्यालय को राज्य सरकार की गारंटी पर भी भरोसा नही रहा क्या?. जब प्रवेश प्रक्रिया से एडमिशन हुआ है, छात्रव्रती के फार्म भरे जा चुके है तो थोडा देर से ही सही, शासन से फ़ीस प्रतिपूर्ति आ ही जाएगी. फिर ऐसे नोटिफिकेशन की क्या जरूरत है?.
चल क्या रहा है?.
मतलब बीए जैसे कोर्स अगर कोई प्राइवेट संस्थान से कर रहा है तो उसका भी रिजल्ट तब तक जारी नही होगा जब तक कि राज्य सरकार उसकी छात्रवर्ती की फीस नही भेजेगी।
वैसे यह मुझे अच्छा लगा। एससी/एसटी को ज्यादा ही कट्टरवादी होने का भूत चढ़ गया है। उतरना भी जरूरी है।

Moral Stories of The Lord Kabir Das




कबीर दास के दोहे अर्थ सहित | Kabir das Ke ...






कबीर दास जी के दोहे :-
1.
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ :- सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।
2.
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
अर्थ :- मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !
3.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !
4.
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥
अर्थ :- कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और जोआज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !
5.
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥
अर्थ :- कबीर दस जी कहते हैं कि परमात्मा तुम मुझे इतना दो कि जिसमे बस मेरा गुजरा चल जाये , मैं खुद भी अपना पेट पाल सकूँ और आने वाले मेहमानो को भी भोजन करा सकूँ।
6.
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
अर्थ :- कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों !
7.
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अर्थ :- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।
8.
पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत ।
सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत ॥
अर्थ :- पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छी है. चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो. फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है !
9.
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ :- जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
10.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ :- बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
11.
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
अर्थ :- इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।
12.
देह धरे का दंड है सब काहू को होय ।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय॥
अर्थ :- देह धारण करने का दंड – भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है. अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए – दुखी मन से सब कुछ झेलता है !
13.
कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥
अर्थ :- इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं. सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं |
14.
मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग ।तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग ॥
अर्थ :- बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उससे तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है
15.
रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय ।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥
अर्थ :- रात सो कर बिता दी, दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की – कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया – इससे दुखद क्या हो सकता है ?
16.
हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार ।
कौतिकहारा भी जले कासों करूं पुकार ॥
अर्थ :- दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक दिन जल जाता है. समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है. जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे गुहार करूं – विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं ! सभी का अंत एक है !
17.
पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल।
कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल ॥
अर्थ :- बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है – ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?
18.
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ :- कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।
19.
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ :- जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।
20.
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ :- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।
21.
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !
22.
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।
अर्थ :- सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।
23.
जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
अर्थ :- इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।
24.
कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।
25.
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।
अर्थ :- शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।




Kabir Das Moral Story How To Remember God In Busy Life Also ...
26.
कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा
27.
माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर।
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ।
अर्थ :- कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।
28.
मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई।
पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई।
अर्थ :- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।
29.
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ॥
अर्थ :- रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी
30.
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥
अर्थ :- खजूर के पेड़ के समान बड़ा होने का क्या लाभ, जो ना ठीक से किसी को छाँव दे पाता है और न ही उसके फल सुलभ होते हैं।
31.
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ :- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।
32.
हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह।
सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह॥
अर्थ :- पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है.सूखा काठ – लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? अर्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है. निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ?
33.
कहत सुनत सब दिन गए, उरझी न सुरझ्या मन।
कहि कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन॥
अर्थ :- कहते सुनते सब दिन बीत गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया ! कबीर कहते हैं कि यह मन अभी भी होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के ही समान है.
34.
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण।
कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण॥
अर्थ :- बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे. इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा.

35.
झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह।
माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह॥

Saturday, 13 June 2020

* ये है भारत का असली इतिहास, बाकि सब झूठ है

A Brit is offering a guided walk through Indian history, via ...


इस पोस्ट के अन्दर दबे हुए इतिहास के पन्ने है l जिसमें
1- मूलनिवासी द्रविड कौन है?
2- देवी-देवता कौन है?
3 - आर्य कौन है?
4- जातिवाद,पूँजीवाद क्या है?

*इस पोस्ट को जरूर पड़ेl
*आप द्रविड़ शब्द का अर्थ जानते हो? कुछ लोग मेरे ख्याल से नहीं जानते होंगे l
उनके लिए मैं संक्षिप्त में जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ। द्रविड शब्द सभी ने अपने विद्यार्थी जीवन में अवशय पढ़ा होगा l साथ ही यह भी पढ़ा होगा की भारत देश की सभ्यता आर्य और द्रविड लोगों की मिली-जुली सभ्यता हैl और यह भी पढ़ा होगा की आर्य बाहर से आये हुए लोग है। हमारे भारतीय इतिहासकार लोगो ने बहुत सारी बातो को दबा दिया हैl भारत में आर्यों का आगमन हुआ । ये कौन लोग है? कहाँ से आए? भारत में ये लोग है या नही l इस बारे में इतिहासकार इतिहास में लिखते नहीं। क्यों? क्योंकि आज भारत देश में इतिहास लिखने वाले आर्य लोग ही है लेकिन आप उसे पहचानते नहीं। क्या आपको पता है? आपको शिक्षा कब से मिली ? और आप कौन से वर्ण में आते है? इस जाआप ति में क्यों है? आप का इतिहास क्या था?

जिस दिन इन बातो को खोजना शुरू करेंगे। आपको उत्तर मिलना शुरू हो जायेगा।, और जब समझ में आएगा तब आपको अहसास होगा की मैं गुलाम हूँ।आर्यों ने हमें घेर रखा हैl अब मैं कुछ करू। क्योंकि द्रविड कोई और नहीं आप ही द्रविड हो।*

इतिहास के पन्नोे से *आर्य कोई और नहीं ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य ही आर्य है। ये अर्थवा, रथाईस्ट,वास्तारिया जाति के हैl इनका आगमन आज से 4500 साल पहले 2500 ईसा पूर्व भारत में हुआ थाl* ये घुड़-सवार होते थे और लोहे के तलवार रखते थे l ये अपने साथ गाय भी लेकर आये थे। उस समय भारत तीन भागो में बटा था l
पश्चिमोत्तर में राजा बलि का राज था। पूर्वोत्तर में राजा शंकर का राज था l जिसे आप शंकर भगवान कहते होl और दक्षिण में राजा रावण का राज था l जिसे आप हर साल जलाते हो और खुशियां मनाते होl

*आर्य के आगमन के पहले भारत के मूलनिवासी द्रविड लोग थेl उस समय भारत के द्रविड लोग कृषि पशुपालन,पक्के ईटो के घर ,नहाने के लिए स्नानागार, देश-विदेश में व्यापार ,विज्ञानवादी सोच ,मूर्ती निर्माण कला ,चित्रकारी में कुशल,शांति प्रिय ,एक उन्नत सभ्यता थीl

उस समय अन्य देशो से तुलना करे तो हमारी सभ्यता उनसे काफी विकसित थी। आर्यो ने सर्वप्रथम राजा बलि के राज में प्रवेश कियाl झुग्गी-झोपडी बनाकर रहने लगेl चोरी-चकारी करना शुरू किया। द्रविड़ो ने राजा से शिकायत कीl द्रविड़ो ने आर्यों को पकड़ कर राजा के सामने हाजिर किये। आर्यों ने पेट का हवाला दिया l राजा बलि दयालु मानवता प्रेमी थे। उसने माफ़ कर दिया और आर्यों के रहने-खाने का बंदोबस्त कर दिया, और चोरी न करने की सलाह दी l कुछ दिन में राजा और प्रजा के व्यवहार समझ जाने के बाद आर्यों ने एक योजना बनायी l इसमें *बामन नाम का एक आदमी (जिसे आज विष्णु भगवान कहते है) सभी आर्यों में तेज षढ़यंत्रकारी था l पुरे आर्य ग्रुप के साथ राजा बलि के दरबार पहुचे और कहा राजा साहब हम आपके राज में बहुत सुखी है,पर कुछ और हमें चाहिए दे देते तो बड़ी मेहरबानी होती l राजा बलि ने कहा मांगो। आर्यों ने कहा राजा साहब हमने सुना है, आपके राज में त्रिवाचा चलता हैl अर्थात तीन वचन। हमें भी त्रिवाचा दीजिये,
इस प्रकार आर्यों ने छल-कपट पूर्वक राजा बलि के सामने तीन मांगे रखी1- पहली- राजा साहब हमें ऐसी शिक्षा का अधिकार दो, जिसे चाहे हम दे और न चाहे तो न दे।
2- दूसरी-राजा साहब हमें ऐसा धन का अधिकार दो, जिसे चाहे हम दे न चाहे तो न देl
3- तीसरी- राजा साहब हमें ऐसा राज करने का अधिकार दो, जिसे चाहे उसे राज में बिठाये और न चाहे तो न बिठाये।

इसप्रकार आर्यों ने छल-पूर्वक राजा बलि से शिक्षा, धन ,राज करने का अधिकार ले लिए, और राज में स्वयं बैठ गए। सैनिक शक्ति में अपने लोगो का कब्ज़ा करवा दिया। फिर राजा बलि को मारकर जमीन में गाढ़ दिया। जिसे कहा जाता है, विष्णु भगवान ने राजा बलि से दान में धरती पर तीन पग जमीन माँगीl ये तीन पग शिक्षा, धन, राज करने का अधिकार हैl जमीन में गाड़ा,इसे बताया जाता है पाताल लोक का राजा बना दिया। आप तो पढ़े-लिखे हो l जरा सोचो क्या किसी का पैर इतना बड़ा हो सकता है l जो पूरी पृथ्वी को ढक ले। और पूरी पृथ्वी पर कब्ज़ा हो जाए तो विष्णु भगवान को अन्य देश के लोग क्यों नहीं जानते। क्यों नहीं पूजते। इस प्रकार आर्यों ने राजा बलि का राज हड़प लिया l उसी दिन से आर्य और द्रविड(भारत के मूलनिवासी) के बीच युद्ध जारी हैl*

इसके बाद *राजा शंकर का राज हड़पने के लिए योजना बनायी। इसके लिए विष्णु ने अपनी बहन की शादी राजा शंकर से करने के लिए सोचा और शादी का प्रस्ताव भेजा l राजा शंकर का सेनापति महिषासुर था l वो आर्यों की चाल समझ गया था, उसने मना करवा दिया। महिषासुर रोड़ा बन गया। तो आर्य पुत्री पार्वती ने ही महिषासुर को मारने के लिए उसे अपने प्रेम-जाल में फँसाया और खून करने के लिए आठ दिन तक मौका खोजती रही l
नौवे दिन जैसे ही मौका मिला धोखे से त्रिशूल द्वारा हत्या कर दी, और शंकर के पास दासी के रूप में सेवा करने लगी। धीरे-धीरे पार्वती ने अपनी खूबसूरती से शंकर को भी वश में कर लिया और योजनाबद्ध तरीके से राजा शंकर को नशा की आदत लगा दी l इसप्रकार नशा के आदि होकर राजा शंकर का राज-पाठ से मोह-भंग हो गया l

फिर आर्यों ने उनका भी राज चलाया और नशे से आपका शरीर गर्म हो गया यह कहकर हिमालय पर्वत में रहने की सलाह दी l जिसे आज कैलाश पर्वत कहते है।* इसप्रकार दो राज्यों में आर्यों का कब्ज़ा हो गया।
फिर *रावण का राज हड़पने के लिए युद्ध छेड़ दिया गया। विभिषन के दोगलापन के कारण छल से रावण को भी भारी मसक्कत के बाद आखिर में मार दिया गया।* इसप्रकार तीनो राज्यों में आर्यों ने कब्ज़ा कर लिया। *आर्यों ने अपने को देव और भारत के मूलनिवासी(द्रविड) को असुर कहा l इस प्रकार 1500 वर्षो तक चले युद्ध के बाद द्रविड पूर्ण रूप से हार गए। यह युद्ध इतिहास में देवासुर-संग्राम के नाम से प्रसिद्ध है।*

*देवासुर-संग्राम के बाद ही जाति व वर्ण व्यवस्था बनायी। आर्यों ने अर्थवा को ब्राम्हण,रथाईस्ट को क्षत्रिय और वस्तारिया जाति को वैश्य(बनिया) घोषित किया और भारत के मूलनिवासी(द्रविड) को शुद्र घोषित किया।* और शुद्र में दो वर्ग बनाये जितने लोगो ने लड़ा-भिड़ा उसे अछूत शुद्र कहा और बाकि को सछूत शुद्र घोषित किया। तथा सामाजिक एकता तोड़ने के लिए उन्होंने सिर्फ शुद्र की ही जाति बनायीl *आज ये जाति लगभग 6743 की संख्या में हैl* इसकी लिस्ट गूगलनेट में देख सकते है। *ब्राम्हण, क्षत्रिय,वैश्य की कोई जाति नहीं होती l उनका सिर्फ वर्ण ही होता है। जैसे शर्मा, दुबे, चौबे, श्रीवास्तव ,द्विवेदी इनके गोत्र है जाति नहीं*यकीन न हो तो चतुराई से पूछ कर देख लेना।
इस *देवासुर-संग्राम में जो लोग लड़-भीड़ कर जंगल में शरण ली और युद्ध जारी रखा l वो वन शरणागत शुद्र(आदिवासी) ST कहलाये ,और जो लोग लड़-भीड़ कर हार कर वही समाज के बाहर रहने लगे वो (अछूत) SC कहलायेI और बाकि शुद्र सछूत शुद्र कहलायेl जिनमें अन्य (पिछड़ा वर्ग) OBC आता है।*


जिसने जैसा संग्राम किया उसे उतना ही घृणित कार्य दिया गया। *रामायण, महाभारत ,चारो वेद ,उपनिषद,पुराण उसी समय के लिखे गए ग्रन्थ है। इस प्रकार जातियाँ द्रविड की सामाजिक एकता तोड़ने के लिए बनायी गयी और देवी-देवता धार्मिक गुलाम बनाने के लिए बनाए गए।*
*हम देवी-देवता के रूप में सभी आर्यों की पूजा करते है l ये सारे देवी-देवता झूठे(false) हैयह सत्य होता तो पूरे विश्व में देवी-देवता मानतेl भारत में ही क्यों?
* इसप्रकार *शिक्षा का अधिकार, ब्राम्हण ने ले लिया l
* क्षत्रिय ने राज करने का, वैश्य ने धन का अधिकार ले लिया और
* शुद्र(द्रविड) मूलनिवासी को तीनो वर्णों की सिर्फ सेवा करने का काम दिया गया।


जिसे आपने कहीं न कहीं अवश्य पढ़ा होगाl* इसके बाद *महावीर स्वामी ने जाति व वर्ण ब्यवस्था का विरोध किया था l (583 ईसा पूर्व में) पर ज्यादा सफल नहीं हुए।*

मौर्य शासक अशोक और उसका बौद्ध धर्म ...
फिर *गौतम बुद्ध ने (534 ईसा पूर्व) बौद्ध धर्म जो मानव जाति का प्रकृति प्रदत धम्म को खोजा l जो शाश्वत धम्म है। जिसने पूरे विश्व के मानव जीवन का कल्याण खोज निकाला l जाति व वर्ण व्यवस्था को लगभग समाप्त कर दिया था। गौतम बुद्ध के बाद मौर्य वंश में चन्द्रगुप्त मौर्य फिर उसके बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को नई उंचाई दी l

अशोक के पुत्र-पुत्री ने कई देशो में बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार किया l जो आज के समय में 100 से अधिक देश बौद्ध धर्म को अपना चुके हैl कही अंशिक तो कही पूर्ण रूप से। *मौर्य वंश के अंतिम बौद्ध राजा बृहदस्थ ने गलती की l उसने सेनापति के रूप में ब्राम्हण पुष्यमित्र शुंग को घोषित किया। शुंग ने सभी ब्राम्हणो को सेना में भर्ती कर दिया और सेना के सामने अंतिम बौद्ध राजा बृहदस्थ की हत्या कर दी और 84000 बौद्ध स्तूप तोड़ दिए गए। पुष्यमित्र शुंग{ राम } का शासनकाल 32 वर्ष (184 ईसा पूर्व -148 ईसा पूर्व)है। लाखो बौद्धो को काट दिया गया ।एक बौद्ध सिर काटकर लाने का इनाम 100 नग सोने के सिक्के रखा गया।

पुष्यमित्र सुंगा ही बाद में राम भगवान बन गया
भारत की धरती खून से रक्त-रंजित हो गयी। बहुतो ने दूसरे देश जाकर अपनी जान बचायी। सारे बौद्ध ग्रंथ घर से खोज-खोज कर जला दिए गए। इस प्रकार जिस देश में बौद्ध धम्म ने जन्म लिया उस देश से गायब हो गया। आज भारत में जो भी बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक लाये गए वो सब अन्य देशो से लाये गए है। बाद में *पुष्यमित्र शुंग ने मनुस्मृति लिखीl जिसमें शुद्रो के सारे मानवीय अधिकार छीन लिए गए। रामायण, महाभारत को फिर से नए ढंग से नमक मिर्ची लगाकर लिखा गया।

तब से 2000 साल तक शुद्र (SC/ST/OBC) को शिक्षा और धन का अधिकार नहीं मिला था l इस बीच अनेको संत कबीर,गुरुनानक,रविदास,गुरु घासीदास ,और अनेक महापुरुष हुए l जिन्होंने भक्ति मार्ग से लोगों को सत्य का अहसास कराया l लेकिन नैतिक शक्ति-शिक्षा ,राजनितिक शक्ति - वोट देने के अधिकार ,सैनिक व शारीरिक शक्ति-कुपोषण के कारण क्षीण हो गया थाl ब्राम्हण, पेशवाई{मराठा साम्राज्य } में अछूतो की स्थिति अति दयनीय हो गयी थी l इस समय अछूतो को गले में हांडी और कमर में झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था l यह 12 वर्षो तक चला l 1जनवरी 1818 को 500 महार सैनिकों ने 28000 पेशवाई लगभग युद्ध करके ख़त्म कर दीl जिसमें 22 महार सैनिक शहीद हुए थेl* मुग़ल राजाओ ने भी ब्राम्हणों से सांठ-गांठ कर भारत को गुलाम बनाया और ब्राम्हणों के मर्जी से शुद्र को शिक्षा नहीं दी l लेकिन जहांगीर के शासन काल में थाॅमस मुनरो आये थे l यहाँ की अजीब स्थिति देखकर वह दंग रह गए ,उसी के बाद

डच,पोर्तूगाली,फ़्रांसिसी,अंग्रेज आये और कंपनी स्थापित कर भारत को गुलाम बनायाl *थाॅमस मुनरो ने सबको शिक्षा देना शुरू किया l जिसमें पहले व्यक्ति महात्मा ज्योतिबा फुले ने शिक्षा पायी l जो की माली जाति के अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैl शिक्षा पाने के बाद उन्होने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को भी पढ़ाया l इस प्रकार सावित्रीबाई फुले सवर्ण महिला ,शुद्र महिला ,अतिशुद्र महिला में शिक्षा पानेवाली पहली महिला बनीl* ये आर्य सवर्ण लोग अपनी पत्नी को भी शिक्षा नहीं देते, क्योंकि उनकी पत्नी भी द्रविड़ महिला ही है। इसलिए कहा गया है *ढोल ग्वार शुद्र , पशु , नारी ये सब है ताड़न के अधिकारी l शुद्रो को शिक्षा 19वी सदी में 1840 के आसपास ही मिलना शुरू हुआl* सारी क्रांति शुद्रो ने(द्रविड) ब्रिटिश शासनकाल में ही की l

*रामास्वामी पेरियार , डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर के जीवनकाल में कितनी छुआछूत थीl किसी से छुपा नहीं है। डाॅ.आंबेडकर अछूत समाज में पहले व्यक्ति है, जिन्होंने पहली बार मेट्रिक पास किया l ग्रेजुएशन किया, M.A. किया।देश-विदेश से अनगिनत डिग्रीयाँ हासिल कीl*
*डाॅ.आंबेडकर साहब जैसा संघर्ष आज तक किसी ने नहीं किया। अछूत कहे जाने वाले अस्पृश्य समाज को तालाब का पानी पीने का ,मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था l चावदार तालाब का पानी पीने का सामूहिक प्रयास डाॅ.आंबेडकरने पहली बार कियाl* जिसमें अछूतो के संग बहुत मारपीट की गयीl करीब 20 अछूत इस हमले में जख्मी हो गए थे l फिर कालाराम मंदिर में प्रवेश किया। बाबा साहब ने कई सभाए ली,कई समितियों का निर्माण किया ।
*25दिसंबर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया गयाl यही वह ग्रंथ है, जिसमें शुद्रो को नरक सा जीवन जीने के लिए तानाशाही आदेश जारी किये गए।*
देश स्वतंत्र होनेवाला था l उस समय *बाबासाहब से बड़ा कोई विद्वान ही नहीं था l इस कारण संविधान लिखने का अवसर बाबा साहेब को मिला l आज अछूतो को ,शुद्रो को ,महिलाओं को जो भी अधिकार मिले है, चाहे कोई भी फील्ड हो सब बाबासाहब के अथक प्रयास से संभव हुआ है। इसे SC/ ST/OBC/Minority माने या न माने ये उनके ऊपर निर्भर है। अनुसूचित जाति कल्याण आयोग, अनुसूचित जनजाति कल्याण आयोग, अन्य पिछड़ा कल्याण आयोग, धार्मिक अल्प संख्यक कल्याण आयोग (SC/ST/OBC/Minority) के लिए बनाया गया है।

आपको संविधान में सवर्ण कल्याण आयोग कही नहीं मिलेगा। क्यों ? जरा सोचें क्योंकि सवर्ण पहले से ही हर तरह से समर्थ थे। यह *संविधान भारत के मूलनिवासी (द्रविड) के हित व उनका सम्पूर्ण विकास के लिए बनाया गया है। हर जरुरी अधिकार संविधान में डाले गए है। लेकिन अफ़सोस की मूलनिवासियों (द्रविड़) ने आज तक संविधान को खोलकर देखा ही नहीं और सवर्ण के साथ ही संविधान को बिना पढ़े घटिया और बदलने की बात करता हैl* वही अन्य देश के राष्ट्रपति,PM ,कानून के जानकार इसे दुनिया की सबसे महान संविधान कहता हैl

*बाबसाहेब ने संविधान लिखकर मूलनिवासी (द्रविड) को आधी आजादी दी गयी है और आधी आजादी जिस दिन हमारे द्रविड भाई एक हो जायेंगे उस दिन सम्पूर्ण आजादी मिलेगी।आज व्यापार में 95%, शिक्षा में 75%, नौकरी में 75% ,जमीन में 90% इन आर्यों का ही कब्ज़ा है। भाईयों जरा गौर करो SC/ST/OBC/Minority के लोग कितने % व्यापार में हाथ-पाव जमाये हो? 85% मूलनिवासी (द्रविड) सिर्फ ग्राहक बने हो, दुकानदार तो मुख्य रूप से सवर्ण ही है।* बड़े-बड़े उद्योग ,कंपनी, बड़ी-बड़ी दुकाने हर प्रकार का दुकाने कौन चला रहा हैl गौर करोगे तो सब समझ आ जायेगाl लेकिन दुःख की बात है कि, हमारे भाई दूर की सोच रखते ही नहींl *आज सिख, बौद्ध भी द्रविड हैl इसाई,मुस्लिम भी द्रविड हैl मुग़लकाल में हमारे ही द्रविड भाईयो ने हिंदू धर्म की हीनता देख कर मूस्लिम धर्म को अपनायाl अंग्रेजो के शासनकाल में हमारे द्रविड भाईयों ने ही इसाई धर्म को अपनाया। और सिखों ने अपना अलग सा धर्म बनाया। इस कारण सवर्ण लोग कभी सिख दंगा, कभी ईसाई दंगा, कभी मुस्लिम दंगा, कभी बौद्ध पर हमला करता रहता हैl ये सब इनकी सोची-समझी साजिश होती है।*

'''67 साल के बाद आज जैसे ही बीजेपी सत्ता में बहुमत से आई है। गौर कीजिये क्या हो रहा हैl धर्म-धर्म रट रही हैl भारत को हिंदुस्तान करना चाहते है। सिख हिन्दू थे, घर वापसी करो ऐसी बाते करते हैl इनके मंत्री बोल रहे है साध्वी, नाथूराम गोडसे देशभक्त हैl जो आपके राष्ट्रपिता को तीन गोली ठोकता है। 4-5 बच्चे पैदा करो एक इनको दो, एक बोर्डर को दो, बाकी अपने पास रखोl कितना सम्मान करते है महिलाओं का सोचो।
2021तक सबको हिन्दू बनाने की धमकी दी जा रही हैl तो अल्पसंख्यक कहा जायेंगे। इसी कारण ही बाबासाहब ने अल्पसंख्यक को कुछ विशेष अधिकार दिए थेl ताकि बहुसंख्यक इनपर हावी न हो सके। गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना चाहते हैl क्योंकि पुन: युद्ध करा सके। इतने सारे बेतूके बयान दे रहे है और मोदी चुप है क्यों?

*द्रविड भाइयो अब एक हो जाओlयह समय खतरे से भरा हैl अगर टूट कर रहोगे तो फिर याद रखना इतने दिनो तक ब्राम्हणवाद ने मारा अब पूँजीवाद मारेगा और वर्ग संघर्ष की स्थिति निर्मित होगीl शिक्षा का भगवाकरण करके आपके दिमाग को मार रहे है। सरकारी सेक्टर में निजीकरण ,FDI ,PPP, ठेकेदारी करके आपके आरक्षण को मार दिया जा रहा हैl आपकी अगली पीढ़ी दाने-दाने के लिए मोहताज हो जायेगी।*
*जागो मूलनिवासी जागो *
आप ने इसे पढ़ने के लिए समय दिया उसका बहुत बहुत धन्यवाद ।
अब एक एहसान और करदो इस post को अन्य 10-20 साथियों में और SHARE , बस यही तरीका है अपने साथियों को जागरूक करने का।।
नमो बुद्धाय जय भीम जय मूलनिवासी

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